मंगल कामना

*उत्तिष्ठोत्तिष्ठ देवेश*
*उत्तिष्ठ ह्रदयेशय|*
*उत्तिष्ठ त्वमुमास्वामिन्*
*ब्रह्माण्डे मड्गलं कुरु||*
*जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्ति-*
*र्जानाम्यधर्मं न च मे निवृत्ति:|*
*त्वया महादेव ह्रदि स्थितेन*
*यथा नियुक्तोsस्मि तथा करोमि||*


अर्थात- हे देवेश्वर! उठिये उठिये| मेरे हृदय में शयन करने वाले देवता! उठिए| हे उमाकान्त! उठिए और ब्रह्मांड में सबका मंगल कीजिए| मैं धर्म को जानता हूँ, किंतु मेरी उसमें प्रवृत्ति नहीं होती| मैं अधर्म को जानता हूँ, पर मैं उससे दूर नहीं हो पाता| हे महादेव! आप मेरे हृदय में स्थित होकर मुझे जैसी प्रेरणा देते हैं, वैसा ही मैं करता हूँ|


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